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रहीमदास के मशहूर दोहे



रहीमदास के मशहूर दोहे 


 'रहिमन' अती न कीजिये गहि रहिए निज कानि 
सैंजन अति फूले तऊ डार पात की हानि 


सर सूखे पच्छी उड़ै औरे सरण समाहिं 
दीन मीन बिन पच्छ के कहु 'रहीम' कहुँ जाहिं 


 रहिमन दुरदिन के परे बड़ेन किए घटि काज 
पाँच रूप पांडव भए रथवाहक नलराज 


 रहिमन तब लगि ठहरिए दान मान सनमान 
घटत मान देखिय जबहिं तुरतहि करिए पयान 


 भूप गनत लघु गुनिन को गुनी गनत लघु भूप 
रहिमन गिरि तें भूमि लौं लखौ तो एकै रूप 


 समय पाय फल होत है समय पाय झरि जात 
सदा रहे नहिं एक सी का 'रहीम' पछितात 


 रहिमन जो तुम कहत हो संगति ही गुन होय 
बीच उखारी रमसरा रस काहे न होय 


 रहिमन रिस सहि तजत नहिं बड़े प्रीति की पौरि 
मूकन मारत आवई नींद बिचारी दौरि 


 रहिमन आँटा के लगे बाजत है दिन राति 
घिउ शक्कर जे खात है तिनकी कहा बिसाति 


 रहिमन सुधि सबते भली लगै जो बारम्बार 
बिछुरे मानुष फिरि मिलें यहै जान अवतार 


 ससि की सीतल चाँदनी सुंदर सबहिं सुहाय 
लगे चोर चित में लटी घटि 'रहीम' मन आय 


 रहिमन याचकता गहे बड़े छोट ह्वै जात 
नारायण हू को भयो बावन आँगुर गात 


 रहिमन मनहिं लगाइ के देखि लेहु किन कोय 
नर को बस करिबो कहा नारायण बस होय 


 रीति प्रीति सब सों भली बैर न हित मित गोत 
रहिमन याही जनम की बहुरि न संगति होत 


 रहिमन कहत सुपेट सों क्यूँ न भयो तू पीठ 
रीते अनरीते करै भरे बिगारत दीठ 


 रहिमन को कोउ का करै ज्वारी चोर लबार 
जो पत-राखनहार हैं माखन-चाखनहार 


 रहिमन अपने गोत को सबै चहत उत्साह 
मृग उछरत आकाश को भूमी खनत बराह 


 रहिमन तीन प्रकार ते हित अनहित पहिचानि 
पर बस परे परोस बस परे मामिला जानि 


 रहिमन बिद्या बुद्धि नहिं नहीं धरम जस दान 
भू पर जनम वृथा धरै पसु बिनु पूँछ बिषान 


 रहिमन भेषज के किए काल जीति जो जात 
बड़े बड़े समरथ भए तौ न कोउ मरि जात 


 राम न जाते हरिन सँग सीय न रावण साथ 
जो 'रहीम' भावी कतहुँ होत आपुने हाथ 


 रहिमन जगत बड़ाइ की कूकुर की पहिचानि 
प्रीति करै मुख चाटई बैर करे तन हानि 


 महि नभ सर पंजर कियो रहिमन बल अवसेष 
सो अर्जुन बैराट घर रहे नारि के भेष 


 रहिमन अँसुआ नैन ढरि जिय दुख प्रगट करेइ 
जाहि निकारो गेह ते कस न भेद कहि देइ 


 ससि सुकेस साहस सलिल मान सनेह 'रहीम' 
बढ़त बढ़त बढ़ि जात हैं घटत घटत घटि सीम 


 लिखी 'रहीम' लिलार में भई आन की आन 
पद कर काटि बनारसी पहुँचे मगहर थान 

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