मीरा के पद
हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोय
हे री मैं तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोय
सूली ऊपर सेज हमारी किस बिध सोना होय
गगन मँडल पए सेज पिया की किस बिध मिलना होय
घायल की गत घायल जानै की जिन लाई होय
जौहरी की गत जौहरी जानै की जिन जौहर होय
दर्द की मारी बन बन डोलूँ बेद मिल्या नहिं कोय
'मीरा' की प्रभू पीर मिटैगी जब बेद सँवलिया होय
पायो जी मैं ने नाम रतन-धन पायो
पायो जी मैं ने नाम रतन-धन पायो
बस्तु अमोलक दी मेरे सतगुर किरपा कर अपनायो
जनम जनम की पूँजी पाई जग में सब खोवायो
खरचै नहिं कोई चोर न लेवे दिन दिन बढ़त सबायो
सत की नाव खेवटिया सतगुर, भवसागर तर आयो
'मीरा' के प्रभू गिरिधर नागर हरख हरख जस गायो
मेरे गिरिधर-गोपाल दूसरो न कोई
मेरे गिरिधर-गोपाल दूसरो न कोई
जा के सिर मोर-मुकुट मेरो पति सोई
तात मात भ्रात बंधु अपना नहिं कोई
छाँड़ दई कुल की कान क्या करिहै कोई
संतन ढिंग बैठी बैठी लोक लाज खोई
चुनरी के किए टूक टूक ओढ़ लीन्ह लोई
मोती मूंगे उतार बन माला पोई
अँसुवन जल सींच सींच प्रेम बेल बोई
अब तो बेल फैल गई आनंद फल होई
दूध की मथनिया बड़े प्रेम से बिलोई
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिए कोई
आई मैं भक्ति काज जगत देख मोही
दासी मीग गिरिधर प्रभू तारो ब मोही
चलाँ वाही देस प्रीतम पावाँ चलाँ वाही देस
चलाँ वाही देस प्रीतम पावाँ चलाँ वाही देस
कहो कसुम्बी सारी रँगावाँ, कहो तो भगवा भेस
कहो तो मोतियन माँग भरावाँ, कहो छिटकावाँ केस
मीरा के प्रभू गिरिधर-नागर सुनियो बिरद के नरेस
भज मन चरण कँवल अबिनासी
भज मन चरण कँवल अबिनासी
जेताइ दीसे धरनि गगन बिच तेताइ सब उठि जासी
कहा भयो तीरथ बरत कीन्हे कहा लिये करवत कासी
इस देही का गरब न करना माटी में मिल जासी
यो संसार चहर की बाजी साँझ पड़ियाँ उठि जासी
कहा भयो है भगवा पहरयाँ घर तज भय सन्यासी
जोगी होय जुगति नहिं जानी उल्टी जनम फिर आसी
अर्ज़ करों अबला कर जोरे स्याम तुम्हारी दासी
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर काटो जम की फाँसी
करम गत टारे नाहीँ टरे करम गत टारे नाहीँ टरे
सतबादी हरिचंद से राजा सो तो नीच घर नीर भरे
पाँच पाडु अरु कुन्ती द्रोपती हाड़ हिमालय गरे
जज्ञ किया बलि लेन इंद्रासन सो पाताल धरे
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर बिष से अमृत करे
मैं बिरहिन बैठी जागूँ, जगत सब सोबै री आली
मैं बिरहिन बैठी जागूँ, जगत सब सोबै री आली
बिरहिन बैठी गड़ महल में मोतियन की लड़ पोवै
इक बिरहिन हम ऐसी देखी अँसुअन की माला पोवै
तारा गिण गिण रैण बिहानी सुख की घड़ी कब आवै
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर मिल के बिछुड़ न जावे
हरि तुम हरो जन की भीर
हरि तुम हरो जन की भीर
द्रोपदी की लाज राख्यो तुम बढ़ायो चीर
भक्त कारन रूप नरहरि धर्यो आप सरीर
हरिनकस्यप मार लीन्हो धर्यो नाहीँ धीर
बूड़ते गजराज राख्यो कियो बाहर नीर
दास-'मीरा' लाल-गिरिधर दुख जहाँ तहं पीर
ऐसी लगन लगाए कहाँ तू जासी
ऐसी लगन लगाए कहाँ तू जासी
तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है तलफ तलफ जिय जासी
तेरे खातर जोगन होंगी करबत लूँगी कासी
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर चरण कँवल की दासी
मैं हरि बिन क्यूँ जिऊँ री माय
मैं हरि बिन क्यूँ जिऊँ री माय
पिय कारन बोरी भई जस काठहि घुन खाय
औषध मूल न संचरै मोहिं लागो बौराय
कमठ दादुर बसत जल महँ जलहि तें उपजाय
मीन जल के बीछुरे तन तलफि के मरी जाय
पिय ढूँढ़न बन बन गई कहूँ मुरली धुनि पाय
'मीरा' के प्रभू लाल गिरिधर मिली गये सुख-दाय
राणा जी मुझे ये बदनामी लगे मीठी
राणा जी मुझे ये बदनामी लगे मीठी
कोई निंदो की बिंदो मैं चलूँगी चाल अपूठी
साँकली गली में सतगुर मिलिया क्यूँ कर फिरूँ अपूठी
सत-गुरु जी सूँ बातज करताँ दुरजन लोगाँ ने दीठी
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर दुरजन जलो जा अँगीठी
नैणा मोरे बाण पड़ी, साई मोहिं दरस दिखाई
नैणा मोरे बाण पड़ी, साई मोहिं दरस दिखाई
चित चढ़ी मेरे माधुरि मूरत उर बिच आन अड़ी
कैसे प्राण पिया बिनु राखूँ जीवणा मूर जड़ी
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपणे भवन खड़ी
'मीरा' प्रभू के हाथ बिकानी लोक कहे बिगड़ी
नींद लड़ी नहिं आवै सारी रात किस बिध होई प्रभात
नींद लड़ी नहिं आवै सारी रात किस बिध होई प्रभात
चमक उठी सुपने सुध भूली चंद्र कला न सोहात
तलफ तलफ जिव जाय हमारी कब रे मिले दीना-नाथ
भई हूँ दिवानी तम सुध भूली कोई न जानी म्हाँरी बात
'मीरा' कहै बीती सोइ जानै मरन-जीवन उन हाथ
दरस बिन दुखन लागे नैन
दरस बिन दुखन लागे नैन
जब से तुम बिछरे मेरे प्रभू-जी कबहुँ न पायों चैन
सबद सुनत मेरी छतियाँ कंपै मीठै लगे तुम बैन
एक टकटकी पंथ निहारूँ भई छ-मासी रैन
बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी बह गइ करवत ऐन
'मीरा' के प्रभू कब रे मिलोगे दुख मेटन सुख देन
मैं अपने सैयाँ संग साँची
अब काहे की लाज सजनी परगट होवे नाची
दिवस भूख न चैन कबहिन नींद निसु नासी
बेध वार को पार ह्वैगो ज्ञान गुह गाँसी
कुल कुटुम्ब सब आनि भैटे जैसे मधु मासी
दास-'मीरा' लाल गिरिधर मिटी जग हाँसी
माई म्हाँरी हरि न बूझी बात
पिंड में से प्राण पापी निकस क्यूँ नहिं जात
रैन अँधेरी बिरह घेरी तारा गिणात निस जात
ले कटारी कंठ चीरूँ करूँगी अपघात
पाट न खोल्या मुखाँ न बोल्या साँझ लग प्रभात
अबोलना में अवध बीती काहे की कुसलात
सुपन में हरी दरस दीन्हों मैं न जारायो हरी जात
नैन म्हाँरा उघड़ि आया रही मन पछतात
आवरा आवरा होय रहियो रे नहिं आवरा की बात
'मीरा' ब्याकुल बिरहनी रे बाल जियो बिल्लात
म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधारी लला चाकर राखो जी
म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधारी लला चाकर राखो जी
चाकर रह सूँ बाग लगा सूँ नित जठ दरसन पासूँ
वृन्दाबन की कुंज गलिन में गोबिंद लीला गासूँ
चाकरी में दरसन पाऊँ सुमिरन पाऊँ खरची
भाव भगाती जागीरी पाऊँ तीनों बाताँ सरसी
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहे गल बैजंती-माला
बृन्दाबन में धेनु चरावे मोहन मुरली वाला
ऊँचे ऊँचे महल बनाऊँ बिच बित राखूँ बारी
साँवरिया के दरसन पाऊँ पहिर कुसुम्मी सारी
जोगी आया जोग करन कूँ तप करने सन्यासी
हरी भजन कूँ साधू आए बृन्दाबन के बासी
'मीरा' के प्रभू गहिर गँभीरा हृदय रहो जी धीरा
आधी-रात प्रभू दरसन दीन्हो जमुना-जी के तीरा
जोगिया तू कब रे मिलेगो आई
जोगिया तू कब रे मिलेगो आई
तेरे ही करन जोग लियो है घर घर अलख जगाई
दिवस न भूख रैन नहिं निंद्रा तुझ बिन कुछ न सुहाई
'मीरा' के प्रभू गिरिधर-नागर मिल कर तपत बुझाई
सखी मेरी नींद नसानी हो
पिया को पंष निहारते सब रैन बिहानी हो
सखियन मिल के सीख दई मन एक न मानी हो
बिन देखे कल ना परे जिय ऐसी ठानी हो
अंग छीन ब्याकुल भई मुख पिय पिय बानी हो
अंतर बेदन बिरह की वो पीर न जानी हो
ज्यूँ चातक दन को रटे मछरी जिमि पानी हो
'मीरा' ब्याकुल बिरहनी सुध-बुध बिसरानी हो
यो तो रंग धत्ताँ लग्यो ए माय
यो तो रंग धत्ताँ लग्यो ए माय
पिया पियाला अमर रस का चढ़ गई धूम घुमाय
यो तो अमल म्हाँरो कबहु न उतरे कोट करो न उपाय
साँप पिटारो राणाजी भेज्यो द्यो मेड़तणी गल डार
हँस हँस 'मीरा' कंठ लगायो यो तो म्हाँ रे नौसर हार
बिष को प्यालो राणाजी मेल्यो द्यो मेड़तणी ने पाय
कर चरणामृत पी गई रे गुणा गोविंद रा गाय
पिया पियाला नाम के रे और न रंग सोहाय
'मीरा' कहै प्रभू गिरिधर-नागर काचो रंग उड़ जाय

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