कबीर के पद
निर्गुन आगे सरगुण नाचै
बाजै सोहंग तूरा
चेला के पाँव गुरू जी लागैं
यही अचम्भा पुरा
तीरथ में तो सब पानी है होवे नही कछू अन्हाय देखा
प्रतिमा सकल तो जड़ है भाई बोले नही बोलाय देखा
पुरान-कुरान सबै बात है या घट का परदा खोल देखा
अनुभव की बात 'कबीर' कहै यह सब है झूठी पोल है देखा
जब मैं भूला रे भाई
मेरे सतगुरू जुगत लखाई
किरिया-करम अधार में छाँड़ा छाँड़ा तीरथ का नहाना
सगरी दुनिया भई सयानी मैं ही इक बौराना
ना मैं जानूँ सेवा-बंदगी ना मैं घंट बजाई
ना मैं मूरत घरी सिंघासन ना मैं पुहुप चढ़ाई
ना हरि रीझै जपतप कीन्हे ना काया के जारे
ना हरि रीझै धोती छाँड़े ना पांचौ के मारे
दया राखि धरम को पालै जग सो रहे उदासी
अपना सा जिब सबको जानै ताहि मिलै अनिवासी
सहै कुशब्द बाद को ग्यागै छाँड़ै गर्व गुमाना
सत्त नाम ताही को मिलिहै कहै 'कबीर' सुजाना
चंदा झलकै यहि घटमानी अंधी आँखिन सूझे नाहीं
यहि घट चंदा यदि घट सूर यहि घट गरजै अनहद तूर
यहि घट बाजै तबल-निसान बहिरा सबद सुनै नहि कान
जब लग मेरी मेरी करी तब लग काज एकौ नहि सरै
जब मेरी ममता मर जाए तब प्रभु काज संचारै आय
जब लगि सिघ रहै बनमांहि तब लगि वह बन फूलै नाहि
उलट स्यार सिह को खाय तब वह बन फूलै हरियाय
ज्ञान के कारन फूलै बनराय फल लगे पर फूले सुखाय
मृगा पास कस्तूरी बास आप न खोजै खोजै घास
साधो यह तन ठाठ तँबूरे का
ऐंचत तार मरोरते खूँटी निकासत राग हजूरे का
टूटे तार बिखर गई खूँटी हो गया धूरम-धूरे का
कहै 'कबीर' सुनो भाई साधो अगम पंथ कोई सूरे का
बेद कहे सरगुन के आगे निरगुन का बिसराम
सरगुन-निरगुन तजहु सोहागिन देख सबहि निज धाम
सुख-दुख वहाँ कछु नहि व्यापै दरसन आठों जाम
नूरै ओढ़न नूरै डासन नूरै का सिरहान
कहैं 'कबीर' सुनो भाई साधो सतगुरू नूर तमाम
कहैं 'कबीर' सुनो हो साधो अमृत-बचन हमार
जो भल चाहो आपनौंं परखो करो बिचार
जे करता तैं ऊपजै तासों परि गायो बीच
अपनी बुद्धि विवेक बिन सहज बिसाही मीच
यहि मेते सब मत चलै यही चल्यौ उपदेस
निश्चै गहि निर्भा रहो सुन परम तत्त सन्देस
कोहि गावौ कोहि धावहू छोड़ो सकल धमार
यह हिरदे सब को बसे क्यूँ सेवो सुन्न-उजाड़
दूर हि करता थापि कै करी दूर की आस
जो करता थापि कै करि दूर की आस
जो करता दूरै हुते तो को जग सिरजै आन
जो जानो यँह है नहीं तो तुम धोवो दूर
दूर से दूर भ्रमि भ्रमि निष्फल मरो बिसूर
दुरलभ दरसन दूर के नियर सदा सुख-बास
कहैं 'कबीर' मोहिं व्यापिया मत दुख पावै दास
आप अपनपौ चीन्हहू नख-सिख सहित 'कबीर'
आनंद-मंगल गावहु होही अपनपौ वीर
जो दीसै सो तो नाही है सो कहा न जाई
बिन देखै परतीत न आवै कहै न को पतियाना
समझा होय तो शब्दै चीन्है अचरज होय अयाना
कोई ध्याबै निकारा को कोई ध्यावै आकारा
या विधी इन दोनों ते न्यारा जानै जाननहारा
वह राग तो लखा न जाई मात्रा लागै न काना
कहै 'कबीर' सो पढ़ै न परलय सुरत निरत जिन जाना
नारद प्या सो अंतर नाहीं
प्यार जागै तौही जागूँ प्यार सोवै तब सोऊँ
जो कोई मेरे प्यारा दुखावै जड़ा मूल सों खोऊँ
जहाँ मेरा प्या जस गावै तहाँ करौ में बासा
प्यार चले आगे उठ धाऊँ मोहि प्यार की आसा
बेहद तीरथ प्यार के चरननि कोट भक्त समाय
कहैं 'कबीर' प्रेम की महिमा प्यार देत बुझाय
जो खोदाय मसजीद बसतु है और मुलुक कहै केरा
तीरथ-मूरत राम-निवासी बाहर करे को हेरा
पूरब दिसा हरी कौ बासा पच्छिम अलह मुकामा
दिल में खोज दिल हि में खोजौ इहैं करीमा-रामा
जेते औरत-मरद उपानी सो सब रूप तुम्हारा
'कबीर' पोगड़ा अलह-राम का सो गुरू पीर हमारा
परमातम गुरू निकट बिराजैं
जाग-जाग मन मेरे
धाय के पीतम चरणन लागै
साँईँ खड़ा सिर तेरे
जुगनू जुगन तोंहि सोवत बीता
अजहुँ ना जाग सबेरे
अवधू माया तजी न जाई
गिरह तज के बस्तर बाँधा बस्तर तज के फेरी
काम तजेतेंं क्रोध न जाई क्रोध तजेतें लोभा
लोभ तजे अहँकार न जाई मान बड़ाई सोभा
मन बैरागी माया त्यागी शब्द में सुरत समाई
कहै 'कबीर' सुनो भाई साधो ये गम बिरले पाई
मोको कहाँ ढूँढे बंदे मैं तो तेरे पास में
ना मैं देवल ना मैं मस्जिद ना काबे कैलास में
ना तो कौन क्रिया-कर्म में नहीं जोग-बैराग में
ना मैं छगरी ना मैं भेंड़ी ना मैं छूरी गाँड़ास में
नहीं खाल में नहीं पूछ में ना हड्डी ना माँस में
मैं तो रहौ सहर के बाहर मेरी पूरी मवास में
खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं पल-भर की तलास में
कहै 'कबीर' सुनो भाई साधो सब साँसन की साँस में
तू सूरत नहीं निहार वह अंड में सारा है
तू हिरदे सोच विचार यह देस हमारा है
सतगुरू दरस होंय जब भाई वह दें तुम को प्रेम चिताई
सूरत-निरत के भेद बताई तब देखे अण्ड कै पारा है
सकल जगत में सत की नगरी चित्त भुलावै बाँकी डगरी
सो पहुँचे चाले बिन पग री ऐसा खेल अपारा है
लीला सुक्ख अनंत वहाँ की
जहाँ रास-विलास अपारा है
गहन-तजन छूटै यह पाई
फिर नहि पाना सताना है
पद निरवान है अनंत अपारा सुरति-मूरति लोक पसारा
सत्त पुरुष नूतन तन धारा साहिब सकल रूप सारा है
बाग-बगीचे खिली फुलवारी अमृत लहरै हो रही जारी
हंसा केल करत तहँ भारी जहँ अनहद घूरै अपारा है
ता मध अधर सिहासन गाजै पुरुष महा तहँ अधिक विराजै
कोटिन सुर रोम इक लाजै ऐसा पुरुष दीदारा है
पंथ बिना सतराग उधारैं जो बेधत हिये मंझारा है
जन्म-जन्म का अमृत धारा जहँ अधर-अमृत फुहारा है
सत से सत्त सुन्न कहलाई सत्त भँडार याहि के माँही
निःतत रचना ताहि रचाई जो सबहिन ते न्यारा है
अहद लोक वहाँ है भाई पुरुष अनामी अकह कहाई
जो पहुँचे जानेगे वाही कहन सुनन ते न्यारा है
रूप-सरूप कछु वहँ नाहीं ठौर-ठाँव कछु दीसै नाहीं
अजर-तूल कछु दृष्टि न आई कैसे कहूँ सुमारा है
जापर किरपा करिहैं साईं अनहद मारग गावै ताही
उदभव परलय पावत नाहीं जब पावै दीदारा हो
कहै 'कबीर' मुख कहा न जाई ना कागद पर अंक चढ़ाई
मानों गूँगे-सम गुड़ खाई कैसे बचन उचारा हो
खसम न चीन्हे बावरी का करत बड़ाई
बातन लगन न होयंगे छोड़ौ चतुराई
साखी शब्द संदेह पढ़ि मत भुलो भाई
सार-प्रेम कछु और है खोजो सो पाई
प्रथम एक जो आपे आप निराकार निर्गुन निर्जाप
नहिं तव आदि अंत मध-तारा नहि तव अंध धुंध उजियारा
नहि तब भूमि-पवन आकासा नहि तव पावक नीर-नीवासा
नहिं तव सरसुति जमुना गंगा हि तव सागर समुद तरंगा
नहि तव पाप-पुत्र नहि बेद-पुराना नही तब भये कतेब-कुराना
कहैं 'कबीर' विचारी कै तब कछु किरपा नाहिं
परम पुरुष तहँ आप ही अगम-अगोचर माहिं
करता कछु खावै नहि पीवै करता कबहुँ मरै न जीवै
करता के कछु रूप न रेखा करता के कछु बरन न भेखा
जा के जोत-गोत कछु नाहि महिमा वरनि न जाय मो-पाहीं
रूप-अरूप नही तेरा नाँव बर्न-अबर्न नही तेही ठाँव
नाचो रे मेरे मन मत्त होइ
प्रेम का रोग बजाय रैन-दिन शब्द सुनै सब कोइ
राहु-केतु नव-ग्रह नाचै जन्म-जन्म आनंद होइ
गिरी समुंदर धरती नाचै लोक नाचै हंस रोई
छाप-तिलक लगाई बाँस चढ़ हो रहा जग से न्यारा
सहस कला कर मन मेरौ नाचै रीझे सिरजनहारा
या तरिवर में एक पखेरू भोग सरस बह डोलै रे
बाकी संघ लखै नहि कोई कौन भाव सों बोलै रे
दुर्म्म-डार तहँ अति घन छाया पंछी बसेरा लेई रे
आवै साँझ उड़ि जाय बसेरा मरम न काहू देई रे
सो पंछी मोहिं कोई न बतावै जो बोले घट माँही रे
अबरन-बरन रूप नहि रेखा बैठ प्रेम के छाँही रे
अगम अपार निरंतर बासा आवत जात न दीसा रे
कहै 'कबीर' सुनो भाई साधो यह कुछ अगम कहानी रे
या पंछी के कौन ठौर है बूझो पंडित ज्ञानी रे
मोंही तोंहि लागी कैसे छुटे
जैसे कमल-पत्र जल बासा
ऐसे तुम साहब हम दासा
जैसे चकोर तकत निस चंदा
ऐसे तुम साहब हम बंदा
मोहि-तोहि आदि अंत बन आई
अब कैसे लगन दुराई
कहैं 'कबीर' हमरा मन लागा
जैसे सरिता सिध समाई
ना जाने साहब कैसा है
मुल्ला हो कर बाँग जो देवे
क्या तेरा साहब बहरा है
कीड़ी के पग नेउर बाजे
सो भी साहब सुनता है
माला फेरी तिलक लगाया
लम्बा जटा बढ़ाता है
अंतर तेरे कुफर-कटारी
यो नहि साहब मिलता है
साधो ब्रहम अलख लखाया जब आप आप दरसाया
बीज-मद्ध ज्यों बृच्छा दरसै बृच्छा मद्धे छाया
ज्यो नभ-मद्धे सुन्न देखिए सुन्न अनन्त आकारा
नि:अच्छरते अच्छर तैसे अच्छर छर बिस्तारा
ज्यो रवि-मद्धे किरन देखिए किरन-मद्ध परगासा
परमातम में जीव ब्रहम इमि जीव-मद्ध तिमि स्वाँसा
स्वाँसा-मद्धे शब्द देखिये अर्थ शब्द के माहीं
ब्रहते जीव जीवते मन यों न्यारा मिला सदा ही
आपहि वृच्छ बीज अंकुरा आप फूल-फल छाया
आपहि सूर किरन प्रकासा आप ब्रहम जीउ माया
अनन्तकार सुन्न नम आपै मन जीव ब्रहम समाया
आतम में परमातम दरसै परमातम में झाँईं
झाँईं में परछाई दरसै लखै 'कबीरा' साईं
पानी विच मीन प्यासी
मोंहि सुन-सुन आवै हाँसी
घर में वस्तू नजर नहि आवत
बन-बन फिरत उदासी
आतम ज्ञान जग झूँठा
क्या मथुरा क्या कासी
अवधू बेगम देस हमारा
राजा रंक फिकीर बादसा सब से कहौं पुकारा
जो तुम चाहो परमपद को बसिहो देस हमारा
जो तुम आये झीने हो के तजो मना की भारा
ऐसी रहन रहो रे प्यारे सहजै उतर जीवो पारा
धरन-अकास गगन कछु नहीं चंद नहि तारा
सत्त धर्म की है महताबें साहेब के दरबारा
कहैं 'कबीर' सुनो हो प्यारे सत्त-धर्म है सारा
मद्ध अकास आप जहँ बैठे जोत शब्द उजियारा हो
सेत सरूप राग जहँ फूलै साँईँ करत बिहारा हो
कोटिन चंद-सूर छिप जैहैँ एक रोम उजियारा हो
वही पार एक नगर बस्तु है बरसत अमृत धारा हो
कहैं 'कबीर' सुनो धर्मदासा लखो पुरुष दरबारा हो
सत्त नाम है सब तैं न्यारा
निर्गुन सर्गुन शब्द पसारा
निर्गुन बीज सर्गुन फल-फूला
साखा ज्ञान नाम है मूला
मूल गहे तें सब सुख पावै
डाल-पात में मूल गँवायै
साईं मिलानी सुख दिलानी
निर्गुन-सर्गुन भेट मिटानी

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